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पितृपक्ष में मेरा भी तरपण कर दो- संतोष मूरत सिंह(जीवित मुर्दा)

                             योगी जी ये कैसा रामराज्य ?


                                               रिपोर्टर - अशोक सिंह विद्रोही /कर्मवीर त्रिपाठी 

बहुत मुश्किल है जिन्दगी की कहानी लिखना।
जैसे बहते हुए पानी पर हो पानी लिखना।।

सब कुछ खोने से ज्यादा बुरा क्या है ? इस सवाल के जवाब में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ""उस उम्मीद को खो देना जिसके भरोसे हम सब कुछ वापस पा सकते हैं"" भले ही यह कथन विवेकानंद ने बीसवीं शताब्दी में कहे हों, लेकिन इसका हर एक शब्द आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना संतोष मूरत सिंह उर्फ ' मैं जिंदा हूं' के सिस्टम से उम्मीद को लेकर।संतोष ठीक इसी सवाल का शिकार हुए जिसका जवाब  विगत  पन्द्रह वर्ष से उसे  सिस्टम और सरकार से भी नहीं मिला, फिर भी उम्मीद अभी बाकी है ।जब कि वह आज  घर का रहा न घाट का
संतोष मूरत बताते हैं कि, उन्होंने  सरकार में बैठे जनता के माई- बाप और सिस्टम से उम्मीद के सहारे ही अपनी लड़ाई को जारी रखा है। शायद कभी सिस्टम के बहरे कानों तक उनकी   आवाज पहुंच जाए, जैसा कि   पिछली सरकार में हुआ था।
तत्कालीन जिलाधिकारी वाराणसी प्रांजल यादव ने संतोष के मामले को गंभीरता से लेते हुए बाकायदा 6 अधिकारियों की एक कमेटी बनाकर इस जिंदा मुर्दा को उसके समस्त भूमि पर नियमानुसार कब्जा दिलाने का आदेश जारी किया था। सरकारी कागजों में अब मुर्दा हो चुके संतोष बताते हैं कि 9 जुलाई 2013 को कलेक्टर साहब ने एडीएम वित्त एवं राजस्व, एसडीएम, क्षेत्राधिकारी, तहसीलदार, उपनिबंधक- प्रथम तथा थाना प्रभारी, चौबेपुर की एक टीम के गठन का आदेश दिया था। आदेश के मुताबिक संतोष की जमीनों का कब्जा उसे ट्रैक्टर से जोतवा कर दिला दिया गया था। जिसकी रिपोर्ट जिलाधिकारी द्वारा गठित कमेटी ने 10 जुलाई 2013 को प्रस्तुत भी कर दी थी। लेकिन संतोष की परेशानी तब बढी जब स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के प्रशांत महासागर राजस्व विभाग के हीरा- मोती कहे जाने वाले ग्राम पंचायत सेक्रेट्री से लेकर तहसीलदार और ऊपर तक के अधिकारियों ने एक बार फिर अपना खेल - खेल  दिया और चंद रसूखदार एंव खनकदार जेबों के मालिकों के आगे ' सत्यमेव जयते'  को सिर्फ स्लोगन तक सीमित रखकर संतोष मूरत को दोबारा सरकारी पन्ने जिसे आम तौर पर खतौनी बोलते हैं, उसमें अपने जादुई कलम से वायरस की तरह हटा दिया। वह बताते हैं कि इससे पहले भी साल 2003 में गांव की तत्कालीन प्रधान शांति देवी ने अपने रसूख के बूते और चचेरे भाई अजय सिंह से मिलकर 20 अक्टूबर 2003 को भी उनका नाम निरस्त करा कर शांति देवी का नाम दर्ज कराने का कारनामा  कर दिया था।इस जिंदा मुर्दे की मानें तो नाम चढ़ाने और काटने- छाटने का खेल सरकारी कारिंदों ने तोता उड़- मैना उड़ खेल की भाॅति कई बार खेला है। साल 2004 में भी संतोष के मुताबिक उनके चचेरे भाइयों ने उसे मृत दर्ज करा दिया था। परिणामस्वरूप वह आज भी जिन्दा मुर्दा के जाल में जकडा हुआ है और सूबे के  मुख्यमंत्री संतोष  के पड़ोसी जनपद (जौनपुर)में एक कार्यक्रम के दौरान  रामराज्य आने का जिक्र  करते हैं। गैरतलब है कि  रामराज्य में सभी वर्ग के लोग सुखी जीवन जीते थे। सरकारी जिंदा  मुर्दे का सवाल है कि योगी जी  जिन्दा मुर्दो को आप के रामराज्य की सुखद अनुभूति कब होगी !होगी या नहीं यही सवाल कचोट रहा है।
अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर क्यों और कैसे कोई जिम्मेदार महकमा इस तरह का खेल कर जाता है !  प्रदेश में राम राज्य का उदय हो चुका है  सुशासन, अच्छे दिनों की बातें करने वाली सरकार तथा सूट बूट वाले आला हाकिम महज वातानुकूलित  कक्षों में बैठे नीतियां बनाने तक सीमित रह जाते हैं।लेकिन संतोष जैसे हजारो जीवित मुर्दों के जीवन में अच्छे दिन कब आएगें पता नहीं।
संतोष की पीड़ा  राम राज्य के श्रापित अहिल्या  जैसी ही है जिन्हें उनके पति रूपी सिस्टम ने पत्थर का बना दिया था संतोष कहते हैं कि मुझे भी भाजपा के राम राज्य में  पुनर्जीवित होने की उम्मीद है काश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कृपा हो जाए और मुझे भी इस  जड़ समान सरकारी मुर्दा शब्द के श्राप से मुक्ति मिल जाए क्योंकि योगी जी बोलते हैं कि रामराज आने वाला है तो हम भी आस लगाए बैठे हैं कि शायद अहिल्या वाली कहानी  दुबारा सत्य हो जाए।
जिंदा मुर्दा के खेल में संतोष यह सब हाल बयां करते वक्त अपने दर्द को रोक नहीं पाते। अपने  झोले से तमाम सरकारी अरमानों की रद्दी निकाल कर दिखाते हुए कहते हैं कि मानवाधिकार आयोग दिल्ली से लेकर पिछली सरकार के मुखिया अखिलेश यादव और वर्तमान मुखिया भयमुक्त  व भ्रष्टाचार मुक्त के कर्णधार योगी आदित्यनाथ तक से अपनी गुहार लगा चुके हैं ,पर उनका दर्द रामराज्य में भी सिर्फ नासूर ही बना रहा इलाज अभी तक कही से नहीं हो सका है।
 बकौल संतोष  तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने साल 2012 में जनता दर्शन के दौरान मिलने पर लखनऊ के हाईटेक हजरतगंज थाने  में 28 मई 2012 को मुकदमा अपराध संख्या 265 की  एफआईआर दर्ज करवायी थी। जिसमें पूर्व  ग्राम प्रधान श्रीमती शांति देवी सहित कुल 11 लोगों को नामजद करते हुए धारा 420,(छल करना व बेइमानी से बहुमूल्य वस्तु /सम्पत्ति हडपना) 416, (छल )468, (कूट रचना)469,  (ख्यति की अपहानि,कूट रचना और उसका दुरूपयोग)471(कूट रचित दस्तावेज को कपट पूर्वक असली रूप में प्रयोग करना) तथा 506(धमकी) भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार  विवेचना की बात कही गई थी। लेकिन इस एफआईआर में भी खेल हो गया और राजधानी की कोतवाली  हजरतगंज में दर्ज़ मुकदमे को थाना चौबेपुर वाराणसी मुकदमा अपराध संख्या- 337/ 2012 धारा-420, 406, 467, 468, 471 आईपीसी में स्थानांतरित कर दी गयी। जब हमने संतोष की बातों को उपलब्ध दस्तावेजों के सहारे पर टटोला तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जो साफतौर पर इशारा करते हैं कि निजाम बदलते ही संतोष की विवेचना का रुख भी बदल गया जिसकी बानगी फरवरी 2018 में पुलिस महानिदेशालय मुख्यालय, लखनऊ से संतोष द्वारा मांगे गये एक आरटीआई के जवाब के रूप में उपलब्ध है ।
  दस्तावेजों से पता चलता है कि पुलिस मुख्यालय के तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक शिकायत प्रकोष्ठ नितिन कुमार सिंह ने अपने जवाब में लिखे पत्र 8 फरवरी 2018 में साफ तौर पर लिखा है कि चौबेपुर में स्थानांतरित एफआईआर की अग्रिम विवेचना अपराध शाखा द्वारा बनारस से अपर पुलिस अधीक्षक अपराध के पर्यवेक्षण में गुण दोष पर कराने का जिक्र किया है। जिसमें क्षेत्राधिकारी पिंडरा की आपत्तियों को भी शामिल करते हुए विवेचना में लापरवाही बरतने के संबंध में सूबे के हाईटेक बहादुर खाकी के थाना चौबेपुर के विवेचक के विरुद्ध प्रारंभिक जांच का
भी आदेश भी दिया गया था। साथ ही साथ इस पत्र में कब्जे को लेकर तनाव के चलते संतोष मूरत जिंदा मुर्दा की सुरक्षा सुनिश्चित कराने की बात भी कही गई थी। बावज़ूद इसके संतोष के मुताबिक उन्हें आजतक कोई सुरक्षा नहीं मिली और तत्कालीन जिलाधिकारी प्रांजल यादव द्वारा  काशीराम आवास योजना में दिया गया घर भी उनसे छिन गया। जिंदा और मुर्दा जैसे तकनीकी शब्दों के जाल में उलझे संतोष मूरत के साथ सरकार और सरकारी सिस्टम ने ऐसा सितम किया है कि जिस का हर्जाना जिम्मेदार दोषी सरकारी अमले के विरुद्ध कार्यवाही से कमतर तो नहीं हो सकता। सूबे में रामराज्य की सरकार है।सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश का सपना कहीं मुंगेरीलाल के हसीन सपने तक ही न सीमित रह जाए यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।  संतोष की समस्या उसकी आंखों से लेकर थकी साँसो तक में रची बसी है। उसे मलाल है सिस्टम से, रिश्तो से और सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ से, जो उसके  मुताबिक जनता दर्शन के दौरान एक फोटो जिंदा भूत के साथ खिंचाने से  संकोच तो करते हैं लेकिन अपने बातों के बूते पर संतोष को महज 24 घंटे में जिंदा कराने का आश्वसन भी देते हैं, आखिर मामला सरकारी मुर्दे का जो है। इन्वेस्टरमीट से लेकर तमाम आयोजनों तक में फोटो खिंचवाने से संकोच ना करने वाले योगी जी शायद संतोष के मुद्दे पर मौन रहना ही मुनासिब समझते हैं।किसी शायर ने सच ही कहा है।
' '  ये दिखावे की सभी हमदर्दियाॅ   जम जाएंगी, पोछिए मत मेरे आंसू उंगलियां जल जायेंगी।' '



आओ चले तर्पण करें पितरों के साथ ही सरकारी फ़ाइलों में दर्ज  जिंदा मुर्दा  संतोष जैसो का।
सरकार हैं योगी जी की जिनका कहना हैं गुंडे माफ़िया भाग जाऐ,  सरकार हैं सवा सौ करोड़ के चौकीदार मोदीजी की,  जो बनारस को क्योटो अब गेटवे बना रहे हैं उनकी नई माँ गँगा ने उन्हें बुलाया था।
बहरहाल इन सब राजनैतिक बातों से इतर आज बात हैं बनारस के बाशिंदे संतोष मूरत सिंह उर्फ़ ' मै जिंदा हूँ', , ,  की। 
लोग गले में पेशे के मुताबिक़ अपने को दर्शाने के लिऐ टाई, आला, बो पहनते हैं लेकिन यूपी की सरकार और भ्रष्ट  अधिकारी गण  बनारस ने संतोष के गले में एक तख्ती टांगने का कारनामा कर दिया ।

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