पेश हैं माई नेशन टीम की ख़ास रिपोर्ट
अशोक सिंह विद्रोही /कर्मवीर त्रिपाठी/ सुधीर वर्मा की कलम से
उत्तर प्रदेश - यह
लोकतंत्र है साहब यहाॅ मुर्दे जिन्दा हैं।ये डिजिटल इंडिया के जिंदा
मुर्दे अपने जैसे मुर्दो से ही नहीं अपितु देश के गृह मन्त्री प्रदेश के
मुख्यमंत्रियों से भी समय - समय पर मिलते रहे हैं ।यह तथ्यहीन नहीं कह रहा
हूं प्रमाण हैं। इस लोकतंत्र में आप और हम कब तक जीवित रहेगें? इसका
लेखा-जोखा यमराज व महाकाल के इतर सरकार के राजस्व विभाग के पास ही है।
राजस्व विभाग की असीम कृपा से देश भर में हजारों की संख्या में जीवित
मुर्दे हो गये हैं। कहने का मतलब है कि इस लोकतंत्र में जीवित मुर्दो की
तादात में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गयी है ।जिसके चलते इसी विभाग की कृपा से
वर्षो पूर्व एक संगठन "मृतक संघ " खड़ा हुआ है। इसी मृतक संघ के
अध्यक्ष मृतक लाल बिहारी हैं। मृतक संघ से हजारों जीवित मुर्दे जुड़े हुए
हैं।मृतक लाल बिहारी का दावा है कि उत्तर प्रदेश में पचास हजार से अधिक
जीवित मृतक हैं।कहने का मतलब है कि मुर्दे जिन्दा हैं। सभी जीवित मुर्दों
की जननी राजस्व विभाग ही है।
इसी विभाग का मारा एक
मुर्दा राम और कबीर का सूबा उत्तर प्रदेश के महाकाल की नगरी वाराणसी का
बाशिंदा भूतपूर्व सैनिक स्वगीय राम मरत सिंह का पुत्र जीवित मुर्दा
संतोष मूरत सिंह है। क्या साहब यही लोकतंत्र है? नहीं साहब यह तो
भ्रष्टाचार का मूलतंत्र है।माना कि यही लोकतन्त्र है तो इसका सिस्टम ठीक
नहीं है।क्योंकि यह सब मुर्दे जो जिन्दा हैं सब के सब सिस्टम के सितम के
मारे मुर्दे जिन्दा हैं।यही मुर्दे जिन्दा भूत हैं। राजस्व विभाग की
कार्यप्रणाली से जीवित भूतों का देश भारत बन रहा है ।
राजस्व
विभाग जीवित को मुर्दा बनाने में समय जाया नहीं करता परन्तु इन जिन्दा
भूतों को खुद जिंदा साबित करने में कई दशक लग जाते हैं। कितने तो जिन्दा
भूत रहते ही मर जाते हैं।क्या साहब यही लोकतन्त्र है ?हमारी समझ से
लोकतंत्र का सिस्टम ठीक नहीं है क्योंकि यह सब सिस्टम के सितम के मारे
जिन्दा भूत हैं। इन जीवित मृतक भूतों का संतोष यदि डगमगाया तो लोकतंत्र के
इस सिस्टम की चुल्हें दरक जाएंगी।विद्रोह का स्वर यदि इन जीवित मृतकों में
जगा या फिर आतंक की राह पकडी तो लोकतंत्र में राजतंत्र के सिस्टम को
प्रभावित होना तयऔर यह होगा मेक इन इंडिया ।
राजस्व
विभाग का लेखपाल तहसीलदार भू-माफिया से साठगांठ कर अवैध कमाई के लिए जीवित
को मुर्दा बनाने का खेल कर रहे हैं।सरकार के संज्ञान में यह खेल है पर वह
भी खामोश है। प्रदेश की वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे चुनावी
घोषणा पत्र में मुद्दा भी बनाया पर सरकार अपने इस कार्यकाल के दूसरी
वर्षगांठ के समीप पहुच रही है अभी तक कोई कार्यवाही नजर नहीं आ रही है फिर
भी सरकार के राजस्व विभाग के कर्मियों द्वारा तैयार किए गए ये जिंदा भूत
(संतोष मूरत सिंह वाराणसी गुजर पाल प्यारी दावी ओझा गिरी धीरज देवी पलटन
यादव आजमगढ गाजीपुर की तिजिय)हैं।यह तो सिर्फ बानगी भर ही है ।प्रदेश के
अन्य जनपदों में भी ऐसे न जाने कितने जिंदा मुर्दे टहल रहे हैं। ये जिन्दा
मुर्दे आशा भरी निगाहों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी आप की ओर देख रहे
हैं इनकी करूण पीड़ा को समझिए।इन्हे आशा ही नही वरन विस्वास है कि इस
रामराज्य में हमारा वनवास जरूर पुरा होगा।
प्रधानमंत्री
के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का थाना चौबेपुर के अंतर्गत आने वाला गांव
छितौना निवासी सेना से सेवानिवृत स्वगीय राममूरत सिंह का पुत्र संतोष मूरत
सिंह को चाचा काका ने राजस्व विभाग के लेखपाल तहसीलदार से साठगांठ कर मृतक
बताकर उसकी जमीन हथियाली ।लोकतांत्रिक सिस्टम के इस सितम से वह जीते मुर्दा
हो गया है ।अपने को जीवित बताने के लिए हर उस चौखट पर माथा रगडा गिडगिणाया
पर इस मृत राष्ट्र और नपुंसक लोग पर कोई असर नहीं हुआ । विगत पंद्रह वर्ष
से यह जीवित मुर्दा फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर का रसोईया खुद के जिंदा
होना का इंतजार कर रहा है ।इस इंतजार में उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गयी
नाना की रसोई आमदनी का जरिया भी नहीं रही ।यह अजीब बिडम्बना है कि इन
जिन्दा मुर्दो को हम जिन्दा हैं साहब साबित करने के लिए लम्बा संघर्ष करना
पड़रहा है। साहब यह मृत राष्ट्र है क्या?
यह
पुरर्वती सरकार के मामले हैं कह कर न टालें और न ही जांच के घेरे में डालें
राजस्व विभाग के उन कारिदों की कार्यप्रणाली जगजाहिर है जो अक्षम्य है इन
जीवित मृतकों को उनकी सम्पत्ति के अनुसार व्याज सहित हर्जाना उन्ही
कारिंदों वसूली कर किया जाय।
तुम तन्हा दुनियाॅ से लड़ोगे, बच्चों सी बातें करते हो ।
यह
पंक्तियां जिंदा रहते हुए जिंदगी की जद्दोजहद कर रहे संतोष मूरत सिंह
उर्फ मैं जिंदा हूं पर बखूबी लागू होती हैं। सरकार,सिस्टम, रिश्तों के
छलावे और कारगुजारियों का शिकार हो चुके संतोष जिंदा मुर्दा है, राजस्व
विभाग की कारस्तानियों के बूते पर। दरअसल सरकार बहुत सी योजनाएं, नियम -
कायदे आम आदमियों की सहूलियत के लिए बनाती है लेकिन जब सरकारी फरमान ही
किसी जिंदा जहांन आदमी को ए फोर साइज के कागज पर चंद् सरकारी मुहरों और
रिपोर्टों के आधार पर मुर्दा घोषित कर देती हैं ऐसे में स्मार्ट सिटी,
जीडीपी, विश्व गुरु ,और तमाम तमगों को अपने हिस्से में रखने वाली सरकार और
उसके सिस्टम को इस ओर भी अपनी नजरें इनायत की एक कोशिश जरूर करनी चाहिए।


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