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क्यों दिलों में सभी के खटकती है पुलिस, फिर भी रात दिन दरबदर भटकती है पुलिस

           पुलिस स्मृति दिवस पर अशोक सिंह विद्रोही /कर्मवीर त्रिपाठी की कलम से 

उत्तर प्रदेश - सत्ता में आने और सत्ता से जाने की कई वजहों में से एक कानून व्यवस्था पर सरकार या विरोधी दल अपना-अपना तर्क देते हैं। कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पुलिस व्यवस्था और प्रशासनिक दक्षता को माना जाता है। पिछले कुछ माह से राज्य में  एक के बाद एक घटनाओं से पुलिस पर प्रश्न चिन्ह लगाने से लेकर उनके विद्रोह जैसी स्थिति और गिरते मनोबल को सुशासन के मापदंड पर चुस्त-दुरुस्त करने की जिम्मेदारी सूबे की योगी सरकार और आला हाकिमों पर  है।
  पुलिस सिस्टम का एक महत्वपूर्ण अनुशासित बल है। प्रदेश में लगभग 70 से 80 प्रतिशत  सिपाहियों के बूते पर चल रही खाकी के इकबाल को बुलंद रखना बेहद जरूरी है । पिछले दिनों की घटी घटनाओं से आम जनता और पुलिस महकमे में आये भूचाल के साथ- साथ आईपीएस अधिकारी राजेश साहनी, सुरेंद्र दास जैसे कर्मठ युवा अधिकारियों समेत तमाम पुलिसकर्मियों द्वारा आत्महत्या जैसे कदम उठाने के पीछे की वजहों को जमीनी स्तर पर सुधारने की कवायद भी सरकार को ठोस नतीजों के आधार पर करना जरूरी हो गया है। नहीं तो समाज और सिस्टम के बीच संतुलन का पर्याय पुलिस बल खुद को अकेला ही महसूस करेगा।
                                 सूबे  की पुलिस व्यवस्था में कब करेंगे सुधार
 जब - तब आए दिन वारदातें हो रही हैं तो ये चिंता स्वाभाविक है कि इन पर अंकुश लगाने और अपराधियों को काबू में करने वाला पुलिस तंत्र क्यों विफल या लाचार सा दिखता है। इस सवाल की तह में पुलिस सिस्टम की अलग ही दास्तान खुल जाती है।

विदित हो कि सात दशक बीत जाने के बाद  यूपी पुलिस के मुखिया को अपने सिपाहियों के लिए आठ घंटे की ड्यूटी कर देने का ख्याल आया है। सातों दिन और 14 से 16 घंटे हर रोज काम- ये कार्यक्षमता के लिए एक घातक स्थिति है। अपराध के राजनीतिकरण और राजनीति के अपराधीकरण ने भी पुलिस की मुश्किल बढ़ाई है। खुद पुलिस का राजनीतिकरण उसकी अंदरूनी संरचना को खा रहा है।उपर से आधुनिक हथियारों का अभाव और मुस्तैद ट्रेनिंग की कमी एक विकट समस्या बनी हुई है। 
 पूर्व पुलिस उच्चाधिकारी प्रकाश सिंह ने 1996 में पुलिस सुधारों की अनदेखी के लिए राज्यों के खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में शिकायत भी डाली थी ।अलबत्ता 1998 में जुलियो रिबेरो की अगुवाई में कमेटी बनी इसके पश्चात वर्ष  2000 में पद्मनाभन कमेटी और 2005 में पुलिस एक्ट पर सोली सोराबजी कमेटी का गठन हुआ । सितंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को पुलिस सुधार पर सात निर्देश जारी किए थे।जिसमें मुख्य रूप से  राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से डीजीपी का चयन , ऑपरेशनल ड्यूटी पर न्यूनतम दो साल तक पुलिस अधिकारियों की तैनाती, चरणबद्ध तरीके से जांच पुलिस और कानून व्यवस्था की देखरेख वाली पुलिस का पृथक्कीकरण, डीएसपी और उससे नीचे के पुलिसकर्मियों के लिए पुलिस एस्टेब्लिशमेंट बोर्ड की स्थापना (जो तबादले, पोस्टिग, प्रमोशन और अन्य सेवा संबंधी मामलों को देखे), राज्य और जिला स्तरों पर पुलिस शिकायत प्राधिकरणों का गठन और वृहद सुधार प्रक्रिया के लिए केंद्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की स्थापना। ये निर्देश कितने अमल में आए कोई नहीं जानता है । यही नहीं अभी तक   1861 का पुलिस एक्ट तक बदला नहीं जा सका है। 
                पुलिस की भीतरी समस्याओं से उपजता हैं बदहाल कानून व्यवस्था का वटवृक्ष
 छोटी मोटी घटनाओं से लेकर अस्पताल, श्मशान ,पर्व - त्योहारों तक में मुस्तैद पुलिस बल की मूल समस्याएं दशकों पुरानी है जिस पर आला अधिकारियों से लेकर साथी अधिकारीगण भी ध्यान ही नहीं देते । जर - जर आवास , वेतन विसंगति, वर्दी भत्ते के नाम पर महज 18 सौ रुपए प्रति वर्ष का भत्ता, काम का दबाव और कम पुलिस बल के नाम पर छुट्टियों का अकाल ही पुलिसिंग  सिस्टम में तमाम गड़बड़ियों की जड़ है।
 पिछले दिनों एक प्रेस वार्ता के दौरान सूबे के प्रमुख सचिव गृह की मौजूदगी में पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने भी इस तथ्य को माना था कि लगभग 50 प्रतिशत कांस्टेबलों की कमी के चलते यह व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रखने में समस्याएं आती हैं । बीट स्तर से लेकर जिले स्तर तक पर गैर जरूरी राजनैतिक दबाव दखल और इस काकस को बखूबी समझ चुकी खाकी ने भी बीच का रास्ता निकालते हुए स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेताओं और व्यक्तियों का वरदहस्त प्राप्त कर कुर्सी का लुफ्त उठाने का रास्ता खोज लिया है। इससे इमानदार, कर्मठ पुलिसकर्मी हमेशा साइडलाइन ही रहते हैं। अनावश्यक रूप से लंबे समय तक विवेचनाओं को लंबित रखने से लेकर जांच पड़ताल में हील- हुज्जत जैसी शैली की आदी हो चुकी खाकी के दामन पर जरूरतों और आला अधिकारियों की बदइंतजामी  भारी पड़ती है। छोटी-छोटी आवश्यक सुविधाओं से लेकर आला अधिकारियों  के घर और मेहमानों की तमाम जरूरतों को पूरा करने के लिए नीचे के स्तर के पुलिस कर्मचारियों से लेकर क्षेत्राधिकारी तक की बाकायदा जिम्मेदारी तय होती है । जिस की कुछ बूंदें नीचे स्तर पर भी आपस में अमृत पान के रूप में हो जाया करती हैं।
                                                कमी नहीं है पुलिस में कर्मठता की
  राज्य की पुलिस का गौरवशाली इतिहास कर्मठ और त्वरित निर्णय की क्षमता से संपन्न अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के बूते पर ही रहा है । जिनको आम जनता से लेकर तत्कालीन सरकारों ने भी तवज्जो दी । 
बात अगर पुलिस अधिकारियों की करी जाए तो पूर्व प्रमुख सचिव गृह देवाशीष पांडा ,पूर्व सचिव गृह मणि प्रसाद मिश्र से लेकर पूर्व डीजीपी करमवीर सिंह, विक्रम सिंह, सुलखान सिंह और बृजलाल सरीखे अधिकारियों ने पुलिस सिस्टम को चुस्त-दुरुस्त और आम जनता के हित में काम करने के तमाम कदम उठाए , जो आज भी पुलिस से लेकर आम जनता के बीच तक एक मिसाल है । इसके साथ ही वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी नवनीत सिकेरा ,आशुतोष पांडे, डी के ठाकुर ,राजेश राय सरीखे  अधिकारियों का आम जनता के प्रति व्यवहार और बेहतर पुलिसिंग के लिए आज भी  सम्मान किया जाता है। किसी भी पुलिसिंग सिस्टम के लिए बेहतरीन सूचना तंत्र ,त्वरित निर्णय की क्षमता और फरियादियों की समस्याओं के समाधान का फार्मूला इन अधिकारियों को बखूबी आता है।

ठीक इसी तरह प्रदेश के सैकड़ों पुलिस कर्मचारी भी अपने कर्मठता और सूझबूझ के कारण पुलिस के तमाम रिस्ते घावों पर अपने कर्तव्यपरायण कामों  से कहीं ना कहीं मरहम  लगाते हैं । राजधानी के हजरतगंज स्थित पुलिस अधीक्षक नगर के कार्यालय में कार्यरत राजीव श्रीवास्तव भी उन्हीं में से एक हैं जो ड्यूटी को पहली प्राथमिकता पर रखते हुए लंबे समय से अपने तेज तर्रार छवि के कारण विभाग से लेकर आम आदमी तक के लिए उम्दा पुलिस का बेहतरीन उदाहरण हैं।

 पुलिस समाज, मनोविज्ञान और अपराध शास्त्र को बखूबी समझती है। बस जरूरत है ऊपर स्तर पर बैठे आला हाकिमों से लेकर जिला कप्तानों तक को यह समझने की । जिस कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी के निर्वहन की शपथ के साथ उन्होंने वर्दी पहनी है वह उनके सहयोगी पुलिसकर्मियों तथा आम जनता के "परित्राणाय साधुनाम, विनाशाय च दुष्कृताम्" जैसे शब्द वाक्य को यथार्थ रूप में उतारने के लिए बेहद जरूरी है । नहीं तो थानों की दीवारों पर लिखे सदवाक्य का आपकी सेवा में सदैव तत्पर यूपी पुलिस के लिए कोई सार्थक अर्थ नहीं रह जाएगा।क्योंकि ऐसे में कानून का राज स्थापित करने वाले पुलिस बल का वर्तमान और भविष्य महज वसूली के अमरबेल में तब्दील होने तथा बंदरबांट तक ही सीमित रहेगा ,जो किसी भी रूप में एक बेहतर राज्य के लिए खतरे की घंटी है । 
आधारभूत सुविधाओं की कमी से जूझती पुलिस
काम का बोझ कम करने के लिए नयी भर्तियां करनी होंगी। सिपाही वर्ग की अत्यंत दयनीय स्थिति में फौरन बदलाव करना।   तनख्वाह, रहनसहन, भरणपोषण, आवास, उनके बच्चों की शिक्षा ,स्वास्थ्य आदि जैसे कई मामले हैं जिस पर मानवीय नजरिया रखना बेहद जरूरी है। क्योंकि  एक सिपाही की बदहाली उसे अवसाद और निकम्मेपन का शिकार बना सकती है या भ्रष्टाचार का । 
        पुलिस सुधार पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लेकर राज्य और केंद्र सरकार की अनुपालन स्थिति में एक नया खुलासा हुआ है कि शीर्ष अदालत के निर्देशों को पूरी तरह से किसी भी राज्य  ने लागू ही नहीं किया।  सरकारों ने इन निर्देशों को या तो अनदेखा किया है या स्पष्ट रूप से मानने से इनकार कर दिया । यह अध्ययन कामनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव (सीएचआरआई) द्वारा किया गया है । जो कि प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार मामले में 2006 में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों पर आधारित है।

प्रकाश सिंह( पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश)- सरकार अपने फायदे के लिए पुलिस का दुरुपयोग करती है। राज्य सत्ता के पास पुलिस एक ऐसी ताकत है जो विरोधियों से निपटने से लेकर अपनी नाकामी छुपाने तक में काम  आती है। यह एक मुख्य वजह है  जिस के कारण सरकारी पुलिस प्रणाली में सुधार करने के लिए कोई तैयार नहीं है।

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