मा० मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 15 जून 2017 तक प्रदेश को गड्ढा मुक्त करने की
घोषणा की थी
राजधानी के गोमतीनगर दयाल होटल के सामने की तस्वीर उत्तर प्रदेश- भ्रष्टाचार मुक्त भयमुक्त समाज का वादा हैं, सबका साथ सबका विकास वाली रामराज्य की सरकार हैं । अपने कुल जमा सियासी 60 महीने मेँ से योगी सरकार ने कार्यकाल के 18 माह से अधिक का समय जाँच- पड़ताल और ये बंद वो बंद मेँ खर्च कर चुकी है। बावजूद इसके सड़कों के जिस्म पर नासूर बन चुके गड्ढे हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेते, भले ही गड्ढे विरासत में मिले हो। सरकार बनाने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री बने गोरक्ष पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ ने 15 जून 2017 त क प्रदेश को गड्ढा मुक्त करने की घोषणा की थी, लेकिन क्या कहे साहब गड्ढों का पेट इतना बड़ा साबित हुआ की घोषणा भी गड्ढे में ही चली गयी। खुद मुख्यमंत्री ने 19 मई 2017 को विधानसभा में राज्यपाल के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा था कि ' ' प्रदेश के अंदर 1, 00000 किलोमीटर से अधिक सड़कें उन्हें विरासत में गड्ढा युक्त मिली हैं, जिन्हें हम गड्ढा मुक्त करेंगे। ' ' लेकिन योगी का यह लक्ष्य लगातार बार- बार फेल होता रहा। जैसे-तैसे ' एक साल बेमिसाल' के अवसर पर भी गड्ढा मुक्त सड़कों का आंकड़ा महज सरकारी फाइलों के आंकड़ों से आगे नहीं बढ़ पाया। सूबे का शायद ही कोई कोना हो जहां की सड़कों के आंचल में गड्ढों की पैबस्त ना लगी हो।सडकों की हालत देखकर ये समझ में नहीं आता कि सड़कों में गड्ढे हैं या गड्ढढे में सड़क है। बहरहाल अब जब चुनावी साल की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है तो कील- कांटा दुरुस्त करने के फार्मूले के तहत प्रदेश सरकार ने एक बार फिर ' नौ दिन चले अढाई कोस' के फार्मूले पर चलते हुए 15 अक्टूबर तक सूबे की सड़कों को चकाचक करने के लिए गड्ढों को विकास के नाम पर पाटने की घोषणा की है।इसी से जुड़ी पिछली जाॅच जो बैठायी गयी थी वह उठी या नहीं पता नहीं ।
पिछले
दिनों यूपी के चीफ सेक्रेट्री ए० सी ० पांण्डे ने गड्ढों की राजनैतिक
फजीहत से सरकार को निजात दिलाने के लिए एक मैराथन बैठक कर प्रदेश के सभी
सड़कों को 15 अक्टूबर तक गड्ढा मुक्त करने, निर्माणाधीन सड़कों को 31
दिसंबर तक पूरा करने तथा क्षतिग्रस्त सड़कों का पुरसाहाल लेते हुए 30 नवंबर
तक का सरकारी समय दे दिया। इसके लिए बाकायदा एक ऑनलाइन स्कीम भी जारी कर
दी गयी है। किन्तु लाख टके का सवाल यह है कि जब सूबे में एक ही विकास
कार्य के लिए योगी सरकार कई बार समय लक्ष्य निर्धारित करती नजर आती है और
फिर भी नतीजा सुन बटे सटाका ही नजर आता है तब ऐसे में सरकारी सिस्टम से बने
मार्ग कब तक जनता के साथ ही साथ भ्रष्टाचार का भी बोझ अपने सीने पर लेते
जिंदगी के पहियों को दौड़ा पाएंगे।जब कमीशनखोरी हर निर्माण में एक दस्तूर
है तो बेहतर क्वालिटी का निर्माण एक सपना बन चुका है।
चौराहे का नाम बदला लेकिन सड़क के हालात नहीं
चौराहे का नाम बदला लेकिन सड़क के हालात नहीं
सड़कों
की राजनीति में गड्ढों के बोल बाले में सत्ता शासन की हनक भी साफ नजर आती
है। जब जिसकी सत्ता आती है उसी के चहेते खास लोगों को उपकृत करने के लिए
अधिकारीगण तमाम सड़कों का ठेका देकर मालामाल होने और करने की जुगत में लग
जाते हैं, जिसका सीधा असर सड़कों की गुणवत्ता पर पड़ता है।
जानकार
बताते हैं कि आमतौर पर गड्ढों को भरने के लिए जिम्मेदार विभाग जेएसबी
तकनीक का प्रयोग करते हैं, किन्तु कमीशन का खेल इस तकनीक पर भारी पड़ता
है। एक ठेकेदार ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि विभागों में लगभग 35
से 40 प्रतिशत तक कमीशन का खेल चलता है। क्योंकि आमतौर पर सड़क निर्माण
और मरम्मत की दर लोक निर्माण विभाग के तय दर पर होती है तो टेंडर कराने से
लेकर भुगतान होने तक कमीशन से ही गड्ढे भरते हैं।
अगर
ठेकेदार की माने तो उसका कहना यहां तक है कि सत्ता और अधिकारी से अच्छी
सेटिंग हो तो बिना बनाए या नहीं बनी सड़क का भी दोबारा निर्माण दिखा कर
भुगतान हो सकता है।
मामला महज़ सड़क और गड्ढे का
नहीं, बल्कि इससे जुड़े राजनीति का भी है। प्रभावशाली नेता कई बार सड़कों
का सारा बजट और जाल अपने नफे नुकसान के मुताबिक तय क्षेत्रों में ही कराना
मुफीद समझते हैं, यही कारण है कि सड़कों की किस्मत में भी भेदभाव होता
हैं, कुछ सड़के खास बन जाती हैं तो कुछ को जिम्मेदार विभाग नहीं डालते
घास। कभी पण्डित अटल बिहारी बाजपेई अपने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान लखनऊ
की कपूरथला की जनसभा में भी गड्ढों में सड़क या सड़कों में गड्ढे का
मुद्दा उठाया करते थे। लेकिन आज अटल जी के नाम को भुनाने में लगी भाजपा '
अजेय भारत, अटल भाजपा' का नारा तो देती है लेकिन अटल जी की कर्मभूमि रहे
बलरामपुर और राजधानी लख़नऊ की खस्ताहाल सड़कों की सुध लेने से गुरेज करती
दिखती है।
गौरतलब है कि सूबे की राजधानी से सरकार
में तीन कैबिनेट व एक राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार होने के बावजूद
एलडीए, आवास विकास, नगर निगम और लोक निर्माण विभाग की तमाम सड़कें
खस्ताहाल हैं, जहां आए दिन कोई ना कोई हादसा खबरों की सुर्खियां बन ही जाता
है। खुद सूबे के चीफ सेक्रेट्री अनूप चंद्र पांडे के निजी आवास महानगर
की कई सड़कें सिस्टम को मुँह चिढ़ाती सी लगती है। यही हाल राजधानी के पॉश
कॉलोनी गोमती नगर से लेकर उच्च न्यायालय लख़नऊ खंडपीठ के आस पास तक का है।
कभी चारबाग के रेलवे स्टेशन पर लिखा होता था ' ' ' ' मुस्कुराइये कि आप
लख़नऊ में हैं' ' स्मार्ट सिटी, हाइ टेक पुलिस, स्मार्ट बिजली मीटर जैसे
शब्दो के बीच लख़नऊ की सड़कों पर चलते वक़्त मुस्कुराहट सही सलामत पहुँचने
के फिक्र मेँ कही खो सी जाती हैं।
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
पीडब्ल्यूडी की माने तो विभागीय आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2017 से
दिसंबर 2017 तक प्रदेश की लगभग 1, 07, 000 किलोमीटर गड्ढा युक्त सड़कों
मेँ से लगभग 1, 01, 000 किलोमीटर सड़कों को गड्ढा मुक्त कर दिया गया है।
बहरहाल सरकारी आंकड़ों से इतर सूबे की सूरत कुछ और ही हाल बयां कर रही है।
जौनपुर से लेकर बलरामपुर और हरदोई से लेकर इलाहाबाद तक की गड्ढों वाली
सड़कें अच्छे दिनों की बाट जोहने के अलावा कर भी क्या सकती हैं? जब उनकी
सुध लेने वाले ही आंकड़ों के गिट्टी- मिट्टी में उलझे हैं। आधुनिक सड़कों
के जनक स्कॉटलैंड के इंजीनियर जांन लूडॉन मकादम ने भी कभी यह नहीं सोचा
होगा कि विकास के लिए सड़कों का होना और सही हालत में होने की जरूरत का
पैमाना भारत के स्मार्ट सिटी, क्योटो जैसे शब्दों के जंजाल में उलझ कर कहीं
गुम हो जाएगा। यह हालात तब है जब राज्य सरकार विकास और रोज़गार के नाम
पर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर खर्च करने का दावा करती हैं। गड्ढा
मुक्त और गड्ढा युक्त जैसे सियासी शब्दों से इतर हमें और आपको अपनी
मंजिलों तक पहुंचाने वाली सड़कों का दर्द प्रसिद्ध शायर अदम गोंडवी के इन
पंक्तियों के माध्यम से शायद आलाहाकिम तक पहुंच सके।
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