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लखनऊ माॅ गोमती की असहनीय पीडा-- अशोक सिंह /करमबीर त्रिपाठी/सुधीर वर्मा की कलम से

                    


                                  

 "ये दिखावे की सभी हमदर्दियाॅ जम जायेंगी. पोछिए मत मेरे आँसू उँगलियॉ जल जायेंगी"

लखनऊ- मै गोमती हूँ जिसके किनारों पर कभी लखनऊ की राजधानी बसी तो कभी मेरे ही तट पर नीम करौली बाबा को आध्यात्मिक शान्ति मिलती थी। लखनऊ विश्वविद्यालय.मनकामेश्वर मंदिर. नदवा का आँगन भी मेरे गोद में हैं. लेकिन मेरे आँचल को चंद सरकारी फरमानों और मशीनरी ने दागदार और जीर्णशीर्ण कर दिया हैं।
राजधानी के बीचों बीच बहने वाली माॅ गोमा( गोमती नदी )की हालत नाजुक बताई जा रही है । जलकुम्भी की मार मलमूत्र व रसायनीक कचडे की राजनीति मार झेल रही माॅ गोमा पर अब संरक्षण कार्यक्रम चलाये जाने की नौबत आ गयी है । गोमती जो करोडो को संरक्षित करती रहीं उन्ही को संरक्षित करने की नौबत क्यों आयी? कौन है इसका जिम्मेदार? देश का नागरिक या अफसरशाही या फिर राजनीति?
नदी में गिरने वाले नाले नदी के किनारे स्थित फैक्ट्री जिसका रासायनिक पदार्थ इसमें समाहित कर दिया गया है, आखिर है कौन इसका जिम्मेदार?
               भाईयों-बहनों प्यारे एक सौ पच्चीस करोड देश वासियों यह राजनीति है। यहाॅ मुद्दों में उलझाया जाता है सुलझाया नहीं। खरबों रूपये दशकों से खर्च किये जा चुके हैं।पर सुधार तो कहीं दिखा नहीं ।
इसके सुधार क्यों क्यों नहीं हुए यह यक्ष पश्न सबके मन मस्तिष्क को झकझोर रहा है। जिसका जल आचमन योग्य नही वह जीवन दायनी कैसे बनेगी? है किसी के पास ओम छू छा छूं का मन्त्र जिससे माॅ गोमा पुन: अविरल धारा में आ जाए।
मन्त्रियों, साधू सन्यासी ,स्वमसेवी संगठनों द्वारा नदी सफाई के नाम पर फोटो छिचवाने तक ही सीमित रहा है यह कटु सत्य है ।
      ढोंग नहीं कार्य करने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की भी है। कुछ तो करिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी माॅ गोमा की करूण पुकार सुनिए कठोर निर्णय  लिजिए। प्रदेश की जनता को गोमती की अविरल धारा करके दीजिए ।

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