योगी सरकार के एक वर्ष पूर्ण होने पर खास रिपोर्ट -उम्मीदे,काफी काम बहुत से बाकी
* गड्ढा मुक्त सड़के ,हक़ीक़त से कोसों दूर एक सपना
* कहाँ गया सस्ता भोजन देनें का वादा
* किसान कर्ज माफ़ी,साबित हुआ सस्ता लॉलीपॉप
* अवैध बूचड़ खाने की बन्दी,कितना हकीकत,कितना फ़साना
* यू ० पी ० में देखने लायक तो बहुत कुछ ,दिखाने लायक़ कुछ भी नहीं !! लखनऊ -14 वर्ष तक 5, कालिदास मार्ग से दूर रही भारतीय जनता पार्टी का वनवास 2017 के विधानसभा आम चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ खत्म हुआ तो एक लहर चली मानो अब सूबे में जातिवाद , कानून, व्यवस्था,रोजगार और भाई-भतीजावाद से मुक्ति मिल जाएगी शायद रंगीन सपनों को आंखों में भर कर सूखे से जूझते हुए बुंदेलखंड के किसान से लेकर पूर्वांचल में जापानी बुखार से दम तोड़ते नौनिहालों की स्मृतियों की कसक डबडबाई आंखों से भरे हाथों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से कमल का फूल खिला कर दिया!
दंगों की चपेट से जूझ रहे पूरब से पश्चिम व बेरोजगार नौजवानों ने मोदी जी की हां में हां मिलाई, बावजूद इसके सूबे की एक साल की हो चुकी भाजपा से भगवा रूपी योगी सरकार ने महज अफलातूनी बयानों, सरकारी फरमानों और कर्जमाफी के नाम पर महज़ 40 पैसे जैसे कारनामे करके सोशल मीडिया को गंभीर मुद्दों के साथ सत्ता में आए आमजन के विस्वास रूपी वोट को मजाक बना दिया! भले ही योगी जी और उनके समूचे मंत्रिमंडल के सुरताल
" एक साल बेमिसाल"का राग अलाप रहे हो लेकिन आम जनता जहां तब थी वहीं अब भी है! बस बदला है तो सरकारी विभागों के कागजों, दीवारों व नियम-कायदों का रंग-ढंग !
हमारे संवाददाता - अशोक सिंह/ कर्मवीर त्रिपाठी / सुधीर वर्मा की कलम से सरकार के एक वर्ष पूरे होने पर पुलिस,सरकारी फरमानो,स्वास्थ्य,गड्ढा-मुक्त सड़क, बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों पर हालात-ए- हकीकत की यह रिपोर्ट-
''मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं, मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं!
तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं,कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं!!''
उक्त पंक्तियां प्रसिद्ध कवि दुष्यंत कुमार की है, जो आज के सियासी उठापटक और रस्साकसी पर बखूबी मौजू होती है ! 90 के दशक में पूर्वांचल से कट्टर हिंदू नेता के रूप में अपनी छाप बनाने वाले गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को भारतीय जनता पार्टी ने तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से तमाम किंतु-परंतु के बाद सूबे का उत्तराधिकारी बनाया गया ! कुछ ने इसे नए बदलाव का संकेत माना, तो कुछ के हिसाब से एक संत सत्ता संचालक के रूप में फिट नहीं हिट बैठेगा जैसे कयासों को हवा दी !
बावजूद इसके व्यक्तिगत रूप से कुछ करने की चाह रखने वाले कर्मठ और बेहद भावुक योगी आदित्यनाथ ने जैसे तैसे अपनी नाव को दो उप मुख्यमंत्रियों के पतवार के साथ एक साल पूरे करा दिए यह उन भीतरी और बाहरी विरोधियों के लिए खुशी और गम का कॉकटेल है।
खुद योगी भी यह जानते हैं कि सत्ता की यह डगर कितनी चिकनी और दलदल से भरपूर है! राजधानी के लोकभवन में योगी सरकार के एक वर्ष पूरे होने पर रंगारंग कार्यक्रमों के साथ
"एक साल बेमिसाल" का सुर अलाप रहे योगी और उनकी समूची मंडली भी जन्नत की हकीकत से बखूबी वाकिफ है लेकिन राजनीति की परिभाषा और सिद्धांतों के हाथों सब गड्डम-मड्डम है। ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली भाजपा सरकार में सत्ता के कई पावर पॉइंट है जो कहीं न कहीं योगी के मंसूबों पर गाहे-बगाहे झटके का काम करते रहते हैं।
बात अगर सरकार के दूसरे चक्के अफसरशाही की करें, तो देखने में तो गठरी फिट सी लगती है लेकिन अंदरखाने ढोल में पोल ही पोल है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा कि हकीकत में समस्या सरकार और अफसरशाही के बीच ना होकर सरकार के भीतर और संगठन में है। लंबे समय तक सत्ता से दूर रही भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी दुश्वारी संगठन,संघ व अन्य इकाइयां साबित हो रही है। बात गौर करने वाली है कि पार्टी के एक संगठन मंत्री पी०एम०ओ०के वरिष्ठ नौकरशाह, संघ और सरकार में शामिल कुछ लोग ही कहीं न कहीं योगी जी के लिए चिंता का सबब बने रहते हैं। बात अगर योगी सरकार के चुनावी घोषणा पत्र (लोक संकल्प पत्र) की करें तो 14 दिनों में गन्ना भुगतान,रोजगार,लैपटॉप,मुफ्त शिक्षा जैसे तमाम बिंदुओं पर सरकार मात्र चिंतन मंथन तक ही सीमित है। जिसकी एक वजह लंबे समय तक सत्ता से दूरी और अफसरशाही से बेहतर तालमेल का अभाव भी है, सत्ता में आते ही योगी आदित्यनाथ ने राम राज्य को 21वीं" सदी के उत्तर प्रदेश में उतारने के उतावलेपन में कुछ खास अफसरशाहों के सलाह के आधार पर न्यायालयों के आदेशों के मुताबिक धड़ाधड़ तुगलकी फरमान की तरह " एंटी रोमियो, एंटी भू माफिया, सरकारी कार्यालयों में सुबह 9:00 बजे से जनता की फरियाद सुनने से लेकर तमाम उल्टे सीधे आदेश जारी कर आम जनता से लेकर सचिवालय तक के अफसरों को हलकान कर दिया।
अब सोचने वाली बात यह है कि आयाराम-गयाराम वाले सलाह को देने वाले मंडली की गंगोत्री कहां है! जिससे ऐसी घोषणाओं की गंगा बहती रहती है। जानकार बताते हैं कि वास्तव में मुख्यमंत्री कार्यालय में कुछ ऐसे अफसर काबिज हो गए हैं जो चापलूसी व वाह-वाही के चक्कर में योगी आदित्यनाथ के उद्देश्यों को अपने शातिर अफसरी कलम से घुमा देते हैं,जिससे ऐसी समस्याएं पैदा हो जाती है।
भाजपा के कार्यकर्ताओ के "मुताबिक" संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं के मामूली और वास्तविक कार्य भी नहीं हो पा रहे हैं, जिसके आक्रोश का परिणाम संगम नगरी की फूलपुर लोकसभा सीट और महंत की पारंपरिक मानी जाने वाली गोरखपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव के रूप में दिखा।
भाजपा व योगी भले ही चैनलों व् अखबारों को बयान देते रहें कि यह उपचुनाव के नतीजे हैं 2019 में हम प्रचंड बहुमत के साथ आएंगे। लेकिन जमीनी हकीकत को दोनों ही बखूबी जान चुके हैं तभी तो आनन-फानन मैं सरकार को किसान याद आए, बालू-मौरंग का रेट याद आया।
योगी जी को सोचना चाहिए कि आखिर वे कौन से तत्व है, जो उन्हें ऐसे काल्पनिक आदेशों का पुलिंदा थमाकर आदेश जारी कराने में सफल रहते हैं महज ऊंचे आदर्श के बूते पर ना तो सुशासन लाया जा सकता है और ना ही "रामराज्य" ठीक इसी तरह प्रदेश की कानून व्यवस्था को चाक चौबंद करने में योगी जी की सलाहकार मंडली ने उन्हें ठोकने और एनकाउंटर का ब्रह्मास्थ थमा दिया, जिसकी छाया को लेकर सूबे की खाकी पूरब से लेकर पश्चिम तक ताबड़तोड़ गुंडा मुक्त" प्रदेश नामक अश्वमेघ" सरकारी पिस्टल के घोड़े को दौड़ा रही है।
मजेदार बात यह है, कि यह वही पुलिस है जो परेड व टेस्टिंग के वक्त अपने सरकारी असलहों को ढंग से खोलना व् चला तक नहीं पाती,
दिल को खुश रखने का ग़ालिब यह ख्याल भले ही अच्छा हो लेकिन आम आदमी की तकलीफ थाने से शुरू होकर थाने के अंदर ही खाकी की जेब तक पहुंचने में दम तोड़ देती है साक्ष्य के तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार डी०जी०पी० पुलिस के ट्विटर पर "हमने शायद यह छवि नहीं बिठाई पुलिस की, हमें साहस देने वाली पुलिस की तलाश है लेकिन यह तो कहीं उल्टा ही हुआ अजीब है नैतिक रूप से शायद इसीलिए हर व्यक्ति थाने जाने से डरता है" शिवजीत तिवारी का यह पोस्ट मरहद, जनपद गाजीपुर से आया था।
राजधानी में पिछले दिनों पड़ोसी "जनपद" के एक माननीय की बहन के यहां घटी घटना और पुलिसिया कार्यप्रणाली हरदोई के ही एक अन्य सत्ता पक्ष के विधायक द्वारा थाने पर धरना देने,पत्रकारों पर हुए ताबड़तोड़ हमले और राजधानी के ही करीबी जनपद बाराबंकी के कप्तान की धन वसूली की गाथा तो "महज" सत्ता के केंद्र लखनऊ के आसपास की बानगी भर है,ऐसे तमाम पुलिसिया कांड की गाथा से"अखबारों" व चैनलों के फुटेज रोज-ब-रोज पटे पड़े रहते हैं।
योगी जी के रामराज्य की परिकल्पना में अंग्रेजों के समय सन 1860 में बने पुलिस मेनुअल एक्ट और खाकी की सेट मानसिकता वाली कार्यप्रणाली को पुलिस मुखिया ओ०पी० सिंह और गृह विभाग धोती-कुर्ता पहनाकर तथा खाकी के रंग और धागे को बदलकर शायद ही कभी सुधार सकें।
आए दिन राजधानी की सड़कों पर हो रहे धरने प्रदर्शन, जहां एक तरफ सुशासन की परतों को उधेड़ने का काम करते हैं वहीं दूसरी तरफ अपंग हो चुकी यातायात व्यवस्था की करुण चित्कार ही साबित हो रहे हैं।
हालिया दिनों में बिजली के निजीकरण रूपी सियासी फरमान की चिंगारी कई सरकारी इमारतों पर कटौती के रूप में पढ़ चुकी है,भले ही बकाएदारों की सूची में शामिल ऊर्जा मंत्री इससे बच निकले हो। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगभग हर कार्यक्रम में राजधानी पहुंच चुकी 12 मेट्रो ट्रेन,गोमती रिवर फ्रंट की हो रही दुर्दशा,11लाख दिए जा चुके सरकारी भवनों के नूरानी आंकड़ों में बालू के होने या ना होने जैसे मुद्दों को उठाते रहते हैं, शायद लेकिन सुबे की भगवा सरकार की सलाहकार मंडली इन ज्वलंत समस्याओं को बेहद खूबसूरती से डकारे बैठी हैं।
सरकार के एक वर्ष पूरा होने पर लगभग हर मंत्री ने अपने-अपने विभागों का लेखा-जोखा जारी कर दिया है प्रदेश की गड्ढा मुक्त सड़कों का विवाद तो बहस का एक शाश्वत मुद्दा ही बन गया है,सरकारी आंकड़ों के जादूगर कहे जाने वाले सरकारी अफसरों के फेर में गड्ढा मुक्त प्रदेश की हकीकत जनता बखूबी जानती है।
वैसे ही जैसे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और लक-धग रहने वाले मीडिया प्रेमी मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह का है जो मीडिया में बने रहने की कला में "बखूबी " माहिर है। मंत्री जी ने फूलपुर में उपचुनाव की लुटिया डूबने पर एकदम चुप्पी साध रखी है, वही अपने सरकारी आवास के टपकती छत व बाल्टी की फोटो वायरल करने, अगस्त-सितंबर में बच्चे मरते :::: वाला बयान देकर तथा चंद दिनों पहले झांसी में ईश्वर के जमीनी दूतों डॉक्टर द्वारा मरीज के जमीन पर खड़े होने में बेहद जरूरी अंग पैर को ही काटकर तकिया बनाने तथा आए दिन गोद से लेकर ठेले तक पर अपने मरीज को बेहतर इलाज की आस में भटक रहे तीमारदारों की दुश्वारियां शायद सरकारी तामझाम के बीच नज़र ही नहीं आती।
"एक साल बेमिसाल" है या नहीं, यह एक लंबी बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन बेहद कार्यकुशल जमीनी हकीकत से बखूबी वाकिफ़ योगी आदित्यनाथ को यह जरूर सोचना पड़ेगा कि आम जनता "महज" कोरे आश्वासन, तुगलकी फरमानों और आयाराम-गयाराम जैसे चाल चरित्र व चेहरे वालों को महज कुछ राजनीतिक गुणा गणित की विवसताओं के चलते पार्टी में शामिल कर लेने व अति आत्म-विश्वास आदि - इत्यादि के जुमलों से उत्तर प्रदेश न तो उत्तम प्रदेश बन पाएगा और ना ही वर्ष 2019 की सफलता की गारंटी।
क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी कोई पतित पावन गंगा नहीं है जिसमें चंद डुबकियां लगाकर सबकुछ पवित्र कर लिया जाए और राजनीति के कमंडल के साथ सरकार नाम के महत्वपूर्ण तत्वों का रसास्वाद किया जा सके।
प्रसिद्ध कवि अदम गोंडवी की यह पंक्तियां शायद हकीकत बयां करने के लिए पर्याप्त होगी
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है।
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।।
मायावती- भाजपा सरकार का एक साल बुरी मिसाल है. योगी जी की सरकार को शून्य अंक मिलना चाहिये। इस सरकार की विफलता के कारण ही गोरखपुर व फूलपुर के लोकसभा उपचुनाव में जनता ने उन्हें सबक सीखा दिया है. जनता से वादाखिलाफी का ही नतीजा है कि मुख्यमंत्री को अपनी परंपरागत लोकसभा सीट भी गवानी पड़ी. भाजपा सरकार दलित विरोधी,किसान विरोधी सरकार है जो मेरी हत्या करवाना चाहती है जिससे दलित मूवमेंट को रोका जा सके.इसी लिए प्रदेश में डीजीपी रूप में ओ पी सिंह को नियुक्त किया गया है.
अनिल दुबे- राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी, राष्ट्रीय लोक दल- किसानो तथा नवजवानो को मायूस कर के झूठा जश्न मना रही है. प्रदेश सरकार का एक साल मात्र जुमलों से भरा है. राज्य में कानून व्यवस्था बद से बदतर हो गई है. किसानो को राहत के बजाय उनका शोषण बढ़ गया है। प्रदेश में सम्प्रदायकता का मीठा जहर घोलने और पूँजीपतियों को फायदा पहुंचाने जैसे कार्य किये जा रहे है, जिसके लिए योगीजी ने भरपूर मेहनत की जिसमे वे सौ प्रतिशत सफल रहे है।
अंकुर सिंह - युवा व्यापारी,लखनऊ- विरासत में मिली ख़राब व्यवस्था को दुरुस्त करने में योगीजी पूरी तरह जुटे है। जिस तरह शरीर में दस बीमारियां हो जाने पर इलाज में समय लगता है उसी तरह सरकार को भी कुछ समय देना चाहिए। प्रदेश की कानून व्यवस्था पहले से बेहतर हुई है। अब यूपी भी देश के बेहतर राज्यों की श्रेणी में गिना जा रहा है। इन्वेस्टर सम्मिट के आयोजन से राज्य में निवेश आएगा तो रोजगार और व्यापार भी बढ़ेगा।
परशुराम मिश्र- अधिवक्ता, पूर्व उपाध्यक्छ, लखनऊ बार एसोशिएसन- प्रदेश की सरकार ने अधिवक्ता कल्याण की बात अपने चुनाव घोसणा पात्र में बड़े ही नजर शोर से उठाया था लेकिन एक साल पूरे हो जाने के बाद भी आज तक वकीलों के हित के लिए योगी सरकार ने कुछ खास नहीं किया है। अधिवक्ताओ को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा,प्रदेश के आयोगों ,अधिकरणों में योग्य अधिवक्ताओ की नियुक्ति जैसे कार्य सरकार को करने चाहिए। योगीजी की सरकार न तो बहुत बढ़िया सरकार ही साबित हो पा रही है न ही बेहतर सुशासन ही दे पा रही है।

राम गोविन्द चौधरी- नेता, प्रतिपकछ, सपा- यह सरकार किसान विरोधी,नवजवान विरोधी,छात्र विरोधी, पत्रकार विरोधी और विकास विरोधी है। योगीजी हमारे सरकार के कार्यो को अपना बता कर जनता को भ्रमित कर रहे है। योगीजी जनता बेवकूफ नहीं है, सब जानती है। सरकार ने किसानों को कर्ज माफी के नाम पर छलने का काम किया है। उन्होंने कहा कि बजट में सपा सरकार की नकल तो की गई, लेकिन तमाम विभागों का बजट कम कर दिया गया है।सरकार ने गोरखपुर में रामगढ़ ताल के उद्घाटन के लिए जो नाव मगाये थे उसकी पेंदी ही निकल गई, जिससे कई लोग डूबने से बचे। ये सरकार का नाव घोटाला है। सरकार बताये कि सड़क से लेकर सदन तक गला फाड़-फाड़ कर योगीजी से लेकर उनकी कैबिनेट मंडली तक ने प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगाम लगाने का वादा आमजनता से किया था जिसका आज तक कोई अता-पता नहीं है, क्या ये सरकार बस जुमलों की सरकार है ।



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